سازشِ زندگی

“दी गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स” – अरुंधति रॉय

यादों और एहसासों की माला, थोड़ी अधूरी और थोड़ी टूटी हुई

अरुंधति रॉय की लिखी गई किताब “दी गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स” अंग्रेजी भाषा में लिखे गए भारतीय साहित्य की एक बेहतरीन मिसाल है। जहाँ ज़िंदगी के मामूली पलों को तराश कर इतना ख़ूबसूरत बनाया जाता है कि उसे बार-बार देखने का, अपने साथ घर ले जाने का, बेहद नाज़ुक जानकर संभालने का मन करे। ये समझना मुश्किल नहीं है कि अरुंधति को इस कृति के लिए बुकर पुरस्कार से सम्मानित क्यों किया गया। उनकी नई किताब “मदर मेरी कम्स टू मी” पढ़ने से पहले उनकी लेखनी के सबसे चर्चित नमूने का मुताला करने की इच्छा हुई।

दी वायर के आशुतोष कुमार ठाकुर अपनी “मदर मेरी कम्स टू मी” की समीक्षा में कहते हैं कि इस किताब में स्मृति का बिखराव है। आशुतोष कुमार ठाकुर के ये अल्फ़ाज़ ‘दी गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए भी सही साबित होते हैं। राहेल, एस्था, अम्मू, सोफी मोल, बेबी कोचम्मा, चाको, मार्गरेट कोचम्मा जैसे पात्रों के बिखरे यादों की दास्तां। उनके डर, प्यार, छल-कपट, मासूमियत की दास्तां जो तत्कालीन भारत के डर, प्यार, छल-कपट, मासूमियत की यादों के साथ-साथ चलती है। कभी एक दूसरे में यूं घुल-मिल जाती जैसे दोनों एक ही जिस्मो-जान हो और कभी इतनी अलग हो जाती कि पहले की यादों को दूसरे की दास्तां ने मानो निगल लिया हो। जैसे कि पहले का कोई अस्तित्व ही नहीं था। अरुंधति इसी विडंबना को “गॉड ऑफ़ बिग थिंग्स” बनाम “गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स” का दर्जा देती हैं। “गॉड ऑफ़ बिग थिंग्स” कभी-कभी इतना हावी हो जाता है कि “गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स” को आने वाली कई पीढ़ियों के लिए शिथिल, सुषुप्त बना देता है।

अरुंधति की लेखनी शब्दों को, यादों को, एहसासों को लुभावने मोतियों की माला में पिरोती है मगर फिर भी, यह माला कहीं सूनी तो कहीं टूटी हुई नजर आती है। ऐजाज़ अहमद ने सन् 1997 में “दी गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स” की पैनी आलोचना की थी। मेरे कई जज़्बात वो पहले ही क़ाबिल शब्दों में कह गए हैं। मगर उनकी आलोचना से परे मेरी एक और परेशानी रही अरुंधति का अपने दलित (और सबसे ख़ास) पात्र को कम महत्व देना। जिस गहराई से वें अम्मू, बेबी कोचम्मा, यहाँ तक की कोचू मारिया के व्यक्तित्व को खंगालती हैं, उसके मुक़ाबले वेलुथा का वर्णन कमज़ोर दिखाई देता है। एक दलील दी जा सकती है कि “दी गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स” राहेल-एस्था के परिवार की कहानी है। ख़ून के रिश्तों वाला परिवार। और इस कहानी में वेलुथा का चाहे कितना ही अहम हिस्सा रहा हो, है तो वो बाहरी ही।

मगर इस वास्तविकता के बावजूद, जिस पात्र ने अयमेनेम घराने से अपने ताल्लुकात की कीमत अपनी जान देकर चुकाई, उसे एक बेहतरीन वर्णन–जो दूसरे पात्रों के बराबर हो–पाने का हक़ है। बेबी कोचम्मा, जो वेलुथा के मौत की सबसे बड़ी ज़िम्मेदार बनीं, उनके जीवन की हम छोटी से छोटी बात जानते हैं। अरुंधति बड़े ही विस्तार से हमें बेबी कोचम्मा के “ऐसा” बनने की प्रक्रिया से रूबरू करतीं हैं। यहां तक कि हम कॉमरेड पिल्लई–जिसने मौत को वेलुथा की खटिया तक पहुंचाया–के बारे में भी तफ़सील से सुनते हैं। और वेलुथा? उसके बारे में अरुंधति वही दो-चार अल्फ़ाज़ बार-बार दोहरातीं हैं। उसके जिस्म का रंग, उसके पीठ का निशान, उसकी मुस्कुराहट, उसका बढ़ई का काम, बस। यहाँ तक की वेलुथा और अम्मू का क़रीब आना भी बस चंद पन्नों में निपटा दिया जाता है। उनकी बातें, उनके एहसास, उनका प्रेम, हम कुछ नहीं जानते। सिवाय इसके कि कुछ दो हफ़्तों तक वे हर रोज़ एक दूसरे का आलिंगन में रात गुज़ारते थे।

यही हाल वेलुथा की मौत के बाद अम्मू के जीवन का है। अम्मू का किरदार शुरू से ही एक आज़ादख़्याल, अपने शर्तों पर जीने वाली, समझौता न करने वाली औरत का रहा है। इन्हीं वजहों से वो वेलुथा के क़रीब आती है। मगर वेलुथा की मौत के बाद यही औरत ख़ुद को बेग़ैरती की ज़िंदगी में धकेल देगी और बिना लड़े मौत स्वीकार कर लेगी, ये बात कुछ हज़म नहीं होती। अम्मू लड़ती थी, अपने लिए न सही तो अपने बच्चों के लिए। चाहे ये लड़ाई उसे कितनी ही मुश्किल क्यों न लगे। अम्मू का इस तरह चले जाना उसके क़िरदार से नाइंसाफी है और एक उदासीनता का बोध कराती है। मानों लड़ने वाली, अपने शर्तों पर जीने वाली, प्यार करने वाली औरतों की मौत इसी तरह लिखी है। मानो उनके लड़ने का कोई फ़ायदा नहीं। मानो उन्हें चुपचाप एक दुर्गंध भरे कमरे में बूढ़े पंखे के नीचे दम तोड़ देना चाहिए ताकि अगली सुबह कोई सफाईकर्मी उसकी लाश का मुआयना करे और उसके अंतिम संस्कार पर भी उसके दोनों बच्चे एकसाथ न हों।

वास्तविकता का लोहा मनवाती इस किताब ने अपने दोनों ख़ास किरदारों से नाइंसाफी की है। एक की ज़िंदगी में न झांकती और एक की ज़िंदगी को अचानक, बिना आवाज़ के समाप्त कर देती। “दी गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स” बुकर की हक़दार है, दिल को छू लेने वाली ऐसी घटनाओं से भरी जो हमेशा पाठक के साथ रहेंगी। मुझे बस अफ़सोस है अम्मू और वेलुथा का, जिन्हें इस ख़ूबसूरत किताब में और जगह मिलनी चाहिए थी।